सनातन धर्म की महान कथाओं में नरसिंह अवतार एक ऐसा प्रसंग है जो केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष का जीवंत चित्रण है। जब अन्याय अपने चरम पर था, और जब एक बालक की सच्ची भक्ति अधर्म के सामने डटी हुई थी, तब भगवान विष्णु को नरसिंह रूप में अवतरित होना पड़ा। यह कथा हमें सिखाती है कि जब भक्ति निश्छल हो, और श्रद्धा अडिग हो, तो स्वयं ईश्वर भी भक्त की रक्षा के लिए नियमों को तोड़कर प्रकट हो जाते हैं।
भगवान नरसिंह ( Narshimha Bhagwan) अवतार की कथा — भक्त प्रह्लाद, अधर्म पर धर्म की विजय और सबसे शक्तिशाली कवच की उत्पत्ति
असुरों के राजा हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से एक विशेष वरदान प्राप्त था, जिसके अनुसार वह न दिन में मरेगा, न रात में; न बाहर, न भीतर; न किसी इंसान से, न किसी जानवर से; न अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के घमंड में उसने पूरे ब्रह्मांड में अपनी पूजा अनिवार्य कर दी। लेकिन उसका पुत्र, प्रह्लाद, बचपन से ही भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। यह भक्ति उसे अपनी माता कयाधू से नहीं, बल्कि गर्भ में रहते हुए ही ऋषि नारद के सान्निध्य से मिली थी। जब कयाधू गर्भवती थीं, तब वे कुछ समय तक नारद मुनि के आश्रम में रहीं। नारद जी ने उन्हें श्रीहरि की महिमा सुनाई, और वही उपदेश गर्भस्थ प्रह्लाद ने भी ग्रहण किया।
प्रह्लाद का भगवान विष्णु के प्रति प्रेम
प्रह्लाद का भगवान विष्णु के प्रति प्रेम दिन-ब-दिन गहराता गया। जब वह शिक्षा के लिए असुरों के गुरुकुल में गया, तब भी वह वहां केवल भक्ति और धर्म की बातें करता रहा। यह बात हिरण्यकश्यप को स्वीकार नहीं थी। उसने अपने ही पुत्र को मारने की कई योजनाएं बनाईं। कभी विष देकर, कभी ऊंचे पहाड़ से गिराकर, कभी विषैले सांपों के बीच छोड़कर, यहां तक कि आग में जलाने का प्रयास भी किया गया। लेकिन हर बार प्रह्लाद बचता गया क्योंकि भगवान विष्णु उसकी रक्षा कर रहे थे। जब होलिका ने उसे गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया, तो वह स्वयं जल गई लेकिन प्रह्लाद सुरक्षित रहा।
इसी घटना की याद में आज भी होली जलाई जाती है।
आखिरकार, हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से क्रोधित होकर पूछा, “क्या तेरा विष्णु इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा, “हाँ, वे सर्वत्र हैं।” जैसे ही हिरण्यकश्यप ने खंभे पर प्रहार किया, भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए — अर्ध-सिंह और अर्ध-मानव। यह रूप न मनुष्य था, न पशु। वे संध्या समय प्रकट हुए, जो न दिन था, न रात। उन्होंने हिरण्यकश्यप को महल की चौखट पर पकड़ कर न अस्त्र का प्रयोग किया, न शस्त्र का, बल्कि अपने तीव्र नखों से उसकी हत्या की।
इस प्रकार भगवान ने उस वरदान के प्रत्येक पक्ष को ध्यान में रखते हुए अधर्म का अंत किया।
Narshimha Bhagwan शक्ति और करुणा का अद्वितीय संगम
नरसिंह भगवान का रूप अत्यंत विचित्र होते हुए भी अत्यंत सटीक है:
सिंह का चेहरा — शक्ति और उग्रता का प्रतीक
मानव शरीर — विवेक और भक्ति का प्रतीक
नख और पंजे — यह दर्शाते हैं कि भगवान को किसी अस्त्र की ज़रूरत नहीं, उनका स्वाभाविक रूप ही सब पर भारी है।
Narshimha Bhagwan काअवतार केवल हिरण्यकश्यप के अंत तक सीमित नहीं था। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है — जब अन्याय अपनी सीमाएं पार कर ले, तब धर्म स्वयं स्वरूप बदलकर उसे मिटाता है। भगवान नरसिंह का रूप उग्र था, उनकी आंखों में क्रोध की ज्वाला थी, उनके मुख से गर्जना निकल रही थी, और उनके नाखूनों से प्रचंड शक्ति प्रवाहित हो रही थी। लेकिन वही नरसिंह, जब प्रह्लाद उनके चरणों में आया, तो कोमल हो उठे और उसे अपनी गोद में बिठा लिया। यह दृश्य हमें यह सिखाता है कि ईश्वर अपने भक्तों के लिए रक्षक, और अधर्मियों के लिए संहारक होते हैं।
नरसिंह भगवान(Narshimha Bhagwan)की पूजा क्यों की जाती है?
नरसिंह जयंती हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह दिन उस दिव्य क्षण का स्मरण है जब धर्म की रक्षा के लिए स्वयं भगवान ने अवतार लिया। भक्त इस दिन उपवास रखते हैं, नरसिंह कथा का श्रवण करते हैं, और भगवान की पूजा करते हैं। यह दिन भय से मुक्ति, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा और आत्मबल की प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
भगवान नरसिंह की पूजा विशेष रूप से उन लोगों के लिए की जाती है जो किसी अदृश्य भय, मानसिक तनाव, या शत्रु बाधा से ग्रस्त होते हैं। वे संकट के समय में रक्षक रूप में प्रकट होते हैं और अपने भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। उनकी पूजा से न केवल मन को बल मिलता है, बल्कि जीवन में आत्मविश्वास और साहस भी बढ़ता है।
नरसिंह कवच: सबसे शक्तिशाली रक्षक कवच क्यों माना जाता है?
नरसिंह भगवान की महिमा को और भी विशेष बनाता है उनका दिया गया ‘श्री नरसिंह कवच’। यह कवच सनातन धर्म के सबसे प्रभावशाली और दिव्य कवचों में गिना जाता है। यह शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है और नकारात्मक शक्तियों से दूर रखता है। इसकी रचना ऐसी है कि पाठ करते समय भक्त अनुभव करता है जैसे स्वयं भगवान उसके चारों ओर दिव्य सुरक्षा चक्र बना रहे हों। माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से इस कवच का नित्य पाठ करता है, उसकी रक्षा स्वयं नरसिंह भगवान करते हैं।
यह कवच केवल रक्षा नहीं करता, बल्कि आत्मबल, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।
‘श्री नरसिंह कवच’ को विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण में अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। इसका पाठ करने से:सभी प्रकार के भय दूर होते हैं,भूत-प्रेत बाधाएं खत्म होती हैं,अदृश्य नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है,रोग और मानसिक तनाव में राहत मिलती है।
यह कवच स्वयं प्रह्लाद को भगवान नरसिंह ने दिया था और कहा था —
“जो इसका श्रद्धा से पाठ करेगा, उसकी रक्षा मैं स्वयं करूंगा।”
भगवान नरसिंह का स्वरूप हमें यह भी याद दिलाता है कि ईश्वर की लीलाएं अनेक रूपों में होती हैं। कभी वे श्रीराम बनकर मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, कभी कृष्ण बनकर प्रेम और नीति का मार्ग दिखाते हैं, और कभी नरसिंह बनकर अन्याय और अहंकार का नाश करते हैं। नरसिंह अवतार इस बात का प्रमाण है कि धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर समय-समय पर प्रकट होते हैं, और जब भक्त की भक्ति निष्कलंक हो, तो ईश्वर स्वयं आकर उसकी रक्षा करते हैं।
जब प्रह्लाद का विश्वास अडिग रहा, तो ईश्वर को आना पड़ा
नरसिंह अवतार केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक संदेश है कि जब श्रद्धा सच्ची हो, और धर्म के मार्ग पर कोई निडरता से डटा रहे, तो ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। भक्त प्रह्लाद एक आदर्श हैं — जो आज के युग में भी प्रासंगिक हैं।
और भगवान नरसिंह — शक्ति, न्याय और करुणा के प्रतीक — आज भी हर भक्त के हृदय में विराजमान हैं।
2025 me Bhagwan Narshimha Jayanti
नृसिंह जयंती, हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
इस साल नृसिंह जयंती 11 मई 2025 को मनाई जाएगी।
यह वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को है, जो इस वर्ष 11 मई को पड़ेगी।
इस दिन भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की पूजा बड़े श्रद्धा भाव से की जाती है।
नृसिंह जयंती की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 4:21 बजे से लेकर 7:04 बजे तक है।
इस समय के बीच पूजा करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
नरसिंह अवतार केवल एक लीला नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है —
कि चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, सच्ची भक्ति कभी हार नहीं मानती।
भक्त प्रह्लाद की निष्ठा और विश्वास आज भी हर भक्त के लिए प्रेरणा है।
और भगवान नरसिंह, जो क्रोध में भी करुणा छिपाए हुए हैं,
आज भी अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं और हर भय को अपने नाखूनों से चीर डालते हैं।
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